घटनाक्रम
धार जिले के बाग थाना क्षेत्र के बाणदा गांव से सामने आया एक मामला महज अपहरण या मारपीट की घटना नहीं है। यह घटना धार जिले के आदिवासी अंचल की उस बड़ी सामाजिक त्रासदी की ओर संकेत करती है। रोजगार के अभाव में लोग गुजरात की फैक्ट्रियों में मजदूरी करने जाते हैं और अग्रिम (एडवांस) की रकम कई बार उनके लिए बंधन बन जाती है। ऐसे सैकड़ों मामले गुजरात से जुड़े हैं, जिनमें लोगों पर कार्रवाई नहीं होती है।

मौजूदा विवाद 20 हजार रुपये के अग्रिम को लेकर शुरू हुआ, जो उस समय गंभीर हो गया जब मजदूर की पत्नी को जबरन कार में बैठाकर ले जाने का आरोप सामने आया। पुलिस ने महिला को सुरक्षित बरामद कर दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई है कि क्या आदिवासी मजदूर आज भी आधुनिक दौर में आर्थिक मजबूरी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं।
अग्रिम राशि और विवाद
बाणदा निवासी संतोष देवका पिछले एक वर्ष से अपने परिवार के साथ गुजरात के बारडोली स्थित तरसाली पेपर मिल के पास एक प्लास्टिक कंपनी में मजदूरी कर रहा था। उसने काम के दौरान 20 हजार रुपये अग्रिम लिए थे। कुछ समय बाद पारिवारिक कारणों से वह अपने गांव लौट आया। परिवार में शोक की स्थिति होने के कारण वह तत्काल वापस काम पर नहीं जा सका।
फरियादी संतोष के अनुसार, 9 जुलाई की शाम कंपनी से जुड़े लोग उसके घर पहुंचे। उन्होंने अग्रिम राशि लौटाने या तुरंत काम पर वापस चलने का दबाव बनाना शुरू किया। संतोष ने 15 जुलाई तक पैसे लौटाने की बात कही, लेकिन विवाद बढ़ गया। आरोप है कि उसके साथ मारपीट की गई और उसकी पत्नी रिनुबाई को जबरन कार में बैठाकर ले जाया गया।
पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी
अगले दिन बाग थाने में इस मामले की रिपोर्ट दर्ज हुई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पीड़िता रिनुबाई को सकुशल बरामद कर लिया। पुलिस टीम ने गुजरात के बारडोली क्षेत्र में दबिश देकर घेराबंदी कर दो आरोपितों को गिरफ्तार किया।
गिरफ्तार किए गए आरोपितों में बाग की बंशी कॉलोनी निवासी राज उर्फ भगवान डावर तथा गुजरात के बारडोली निवासी ठेकेदार भावेश पुत्र भीकुभाई पटेल शामिल हैं। मामले के दो अन्य आरोपित अभी फरार हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। थाना प्रभारी हिरुसिंह रावत के नेतृत्व में गठित टीम ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया।
पलायन और बंधुआ मजदूरी का मुद्दा
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि धार, बड़वानी, आलीराजपुर और झाबुआ जैसे आदिवासी जिलों से हर वर्ष बड़ी संख्या में मजदूर गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने के लिए पलायन करते हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर और खेती पर बढ़ती अनिश्चितता उन्हें गांव छोड़ने के लिए मजबूर करती है। कई मजदूर ठेकेदारों के माध्यम से काम पर जाते हैं, जहां अग्रिम राशि उन्हें आर्थिक सहारा तो देती है, लेकिन कई बार यही रकम दबाव का साधन बन जाती है।
श्रम विशेषज्ञ विकास उपाध्याय ने बताया कि अग्रिम लेकर काम करना अवैध नहीं है। हालांकि, यदि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए दबाव डाला जाए, आने-जाने की स्वतंत्रता रोकी जाए या धमकी, हिंसा अथवा बंधन का इस्तेमाल किया जाए, तो यह बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति पैदा करता है। यही कारण है कि बाग की यह घटना केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि श्रमिक अधिकारों और पलायन की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
