सुप्रीम कोर्ट इस कानूनी सवाल पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है कि क्या लगातार गिरफ्तारियों के कारण किसी आरोपी की जारी हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।
यह नोटिस एक गैंगस्टर की याचिका पर जारी किया गया है, जो अगस्त 2021 से हिरासत में है और जिसे कथित तौर पर गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए गए हैं।
शीर्ष अदालत ने हाजी अब्दुल रज्जाक द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि उनकी हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह वर्तमान में उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के कारण हिरासत में हैं।
रज्जाक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार उन्हें लिखित रूप में नहीं दिए गए।
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया और कहा कि हाईकोर्ट ने याचिका को सही तरीके से खारिज किया था।
रज्जाक ने हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में कहा था कि पुलिस ने बार-बार राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) और लगातार नए आपराधिक मामलों का इस्तेमाल करके उन्हें जेल में रखा है। याचिका में यह भी कहा गया कि एनएसए के तहत जारी तीन अलग-अलग हिरासत आदेशों को सलाहकार बोर्ड की मंजूरी न मिलने के कारण रद्द कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जब भी उन्हें आपराधिक मामलों में राहत मिलती है, तब उनके खिलाफ नए मामले दर्ज कर लिए जाते हैं, ताकि उन्हें लगातार हिरासत में रखा जा सके।
